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उम्मीद का सूरज

तुम्हें वतन के टुकड़े होने तक, अपना जंग चलाना है, पर उन टुकड़ों से छलक-छलक लहू तेरा ही बिखरेगा तुम नफरत की आग लगाकर, इस वतन को जला न पाओगे, तुम काली रात मनाओगे, पर सूरज उम्मीद का निकलेगा तुम उनकी दहशत पूजोगे, और उनके झंडे लेहराओगे तुम ढूँढोगे याकूब-अफज़ल , पर घर-घर से हमीद ही निकलेगा "अखिल"